छायावाद और मुकुटधर पाण्डेय

 

बीरू लालबरगाह1, डॉ. जयपाल सिंह प्रजापति2

1सहायक प्राध्यापक (हिन्दी), राजीव गाँधी शासकीय महाविद्यालय, सिमगा जिला बलौदाबाजार-भाटापारा

2विभागाध्यक्ष हिन्दी विभाग, पण्डित सुन्दरलाल शर्मा मुक्तविश्वविद्यालय, बिलासपरु, छत्तीसगढ़

*Corresponding Author E-mail: harishgeetu27@gmail.com

 

शोध सारांश:

पंडित मुकुटधर पाण्डेय ने जबछायावादका नामकरण किया तो उस समय उन्होंने स्वछंदतावादी हिंदी कविता में भी एक विशिष्ट शैली प्रकट होते देखा। अंग्रेजी और बंगला की मिस्टिक कविताओं की तरह ही उसमे अस्पष्टता, भावों का धुंधलापन, रहस्यात्मकता, अज्ञात सत्ता के प्रति जिज्ञासा, समर्पण और आकुलता देखा। पाण्डेय जी के अनुसारछायावादशब्द मिस्टिसिज्म के लिए आयाहै। छायावाद एक ऐसी मायामय सूक्ष्म वस्तु है कि शब्दों द्वारा उसका ठीक-ठीक वर्णन करना असम्भव है। उसमें शब्द और अर्थ का सामंजस्य बहुत कम रहता है। कहीं-कहीं तो इन दोनों में परस्पर संबंध नही रहता, लिखा कुछ और है मतलब कुछ और ही निकलता है। इसमें ऐसा कुछ जादू भरा है कि प्रत्येक पाठक अपनी रूचि और समझ के अनुसार इससे भिन्न-भिन्न अर्थ निकाल सकता है, भिन्न-भिन्न रीति से परन्तु समानभाव से उसका आनंद अनुभव कर सकता है।

 

शब्दकुन्जीः उन्मेष, प्रकट होना मिस्टिसिज्म, यह विश्वास कि साधना तथा प्रार्थना के द्वारा पूर्ण सत्य तथा ईश्वर तक पहुँचा जा सकता है, अध्यात्मवाद, रहस्यवाद. तद्रूप, समान, एक भाव, वैसाही. संघातिक, हनन योग्य अविलम्बित, आश्रित, सहारे पर स्थित, टिका

आकुलता, बेचैनी, परेशानी की परिभाषा

 


प्रस्तावनाः

पंडित मुकुटधर पाण्डेय का जन्म 30 सितम्बर सन 1895 . को बिलासपुर जिला (वर्तमान में जांजगीर-चाम्पा) के बालपुर ग्राम में हुआ था। महानदी के तट पर बसा यह गाँव रायगढ़-सारंगढ़ मार्ग पर चन्द्रपुर जमीनदारी की पूर्व दिशा में स्थित है और अपने प्राकृतिक सुषमा से संपन्न है।

श्री शारदा’, सितम्बर 1920 में प्रकाषित लेख माला का दूसरा लेख हैछायावाद क्या है?’ इसकी प्रारंभिक पंक्तियाँ है, ‘‘हिंदी में यह बिल्कुल नया शब्द है। अँगे्रजी या पाश्चात्य साहित्य अथवा बंग साहित्य की वर्तमान स्थिति की कुछ भी जानकारी रखने वाले तो सुनते ही समझ जायेंगे कि यह शब्द डलेजपबपेउ के लिये आया है।’’1 छायावाद का आरंभ सामान्यतः 1920 . के आसपास से माना जाता है। तत्कालीन पत्र-पत्रिकाओं से पता चलता है कि 1920 . तकछायावादसंज्ञा का प्रचलन हो चुका था। मुकुटधर पाण्डेय ने 1920 . की जुलाई, सितम्बर, नवम्बर और दिसंबर कीश्री शारदा’ (जबलपुर) मेंहिंदी में छायावादशीर्षक से चार निबंधों की एक लेखमाला छपवाई थी।

 

श्री मुकुटधरजी ने भले ही अतिषय विनम्रता से छायावाद प्रवर्तन के संदर्भ में अपने को कविवरप्रसादजी का अनुसरणकत्र्ता कहते हैं; पर स्वयं प्रसादजी ने और आचार्य श्री शुक्लजी ने उन्हें ही छायावाद का प्रवर्तक माना है। द्विवेदी युग में छायावाद के प्रारंभिक पुरस्कर्ता जयषंकर प्रसाद, मैथिली शरण गुप्त, सियाराम शरणगुप्त, मुकुटधर पाण्डेय और लक्ष्मण सिंह क्षत्रियमयंकसिद्ध होतेहैं, किंतु इन कवियों में ‘‘उस समय मुकुटधर पाण्डेय ने ही नूतन पद्धति के साथ अपने को तद्रुप किया’’ 2अतः हिंदी कविता की नई धारा के प्रवर्तक विषेषतः पाण्डेय जी को समझना चाहिए।

 

प्रसाद जी के प्रथम और अंतिम दर्षनशीर्षक के अंतर्गतस्मृतिपँुजमें श्री पाडेय जी लिखते हैं-

सन् 1937 की बात है। मैं रायगढ़ नरेष स्वर्गीय राजा चक्रधर सिंह के साथ प्रवास में था। लाहौर से उन्होंने मुझे काशी भेजा। समाचार पत्र में प्रसादजी की अस्वस्थता का समाचार पढ़ने में आया। मेरी इच्छा उन्हें देख आने की हुई। मैं गोवर्धन सराय स्थित उनके निवासगृह पहुँचा। सूचना मिलते ही उन्होंने मुझे तुरंत बुलवा लिया। वे अटारी पर थे। मैंने देखा वे शैय्या शायी है, उठने-बैठने यहाँ तक कि बोलने में भी असमर्थ। मैने उनकी इस संघातिक अवस्था की कल्पना तक नहीं की थी। हृदय मे ंएक आघात सा पहंुचा। उन्होने अत्यंत धीमी आवाज में कहा- ‘आपछायावाद के प्रवर्तक कवि हैं।मैने कहा-मैने तो आपका अनुसारण किया था।उनकी आँखे सजल हो गई।3

 

छायावाद को परिभाषित करने की चेष्टा प्रकट सर्वप्रथम पण्डित मुकुटधर पाण्डेय द्वारा सन् 1920 में जबलपुर से प्रकाशित होने वाली श्री शारदा नामक पाक्षिक पत्रिका मेंहिंदी में छायावादनामक एवं लेखमाला द्वारा की गयी। उन्होने लिखा कि हिंदी में उस समय छायावाद संबंधी चर्चा कानितांत अभावथा और उसके संबंध में इधर-उधर कुछ टीका टिप्पणियाँ बस मिलती थी।

 

 

पण्डित मुकुटधर पाण्डेय नेछायावादका नामकरण किया, उस समय उन्होंने स्वच्छन्दतावादी हिंदी कविता में भी एक विषिष्ट शैली का उन्मेष देखा। अँगे्रजी और बंगला की मिस्टिक कविताओं की तरह ही उसमें अस्पष्टता, भावों का धुंधलापन, रहस्यात्मकता, अज्ञातसत्ता के प्रति जिज्ञासा, समर्पण और आकुलता देखी होगी। स्वयं उनकी और प्रसादजी की कविताओं में इनकी हल्की सी झलक देखने को मिलती थी।

 

पाण्डेय जी के अनुसार ‘‘यह शब्द मिस्टिसिज्म के लिए आया है। छायावाद एक ऐसी मायामय सूक्ष्म वस्तु है कि शब्दों द्वारा उसका ठीक-ठीक वर्णन करना असंभव है। उसका एक मोटा लक्षण यह है कि उसमें शब्द और अर्थ का सामंजस्य बहुत कम रहा है। वहीं-कहीं तो इन दोनों का परस्पर कुछ भी संबंध नहीं रहता। लिखा कुछ और ही गया है पर मतलब उसका कुछ और ही निकलता है, किंतु पाठक इस शब्द अर्थ के विरोध को देखकर अलंकार शास्त्र के रूपक अथवा व्यंग्य का विभ्रम होने दे। इसमें ऐसा कुछ जादूभरा है कि प्रत्येक पाठक अपनी रूचि और समझ के अनुसार इससे भिन्न-भिन्न अर्थ निकाल सकता है और भिन्न-भिन्न रीति से, परन्तु समानभाव से, उसका आनंद अनुभव कर सकता है। कवि का अभिप्राय उसके लिखने से चाहे जो हो रहा हो, इससे पाठकों का संबंध कुछभी नहीं।’’ 4

 

पाण्डेय जी द्वारा प्रयुक्तछायावादशब्द मिस्टिसिज्म का ही पर्याय था, इसका पता उनके एक अन्य निबंध इस कथन से चलता है कि आज हमेंछायावादको नवीन कहना पड़ रहा है। इसलिए कि मध्य में उनका ह्रास हो गया था। पुनः इसमें पाष्चात्य संस्कृति का प्रभाव भी दिखाई देता है। छायावाद कोमिस्टिसिज्ममानने के कारण वे उसे नया नहीं मानते। पण्डित मुकुटधर पाण्डेय जी नेछायावादका प्रयोग मिस्टिसिज्म के लिए किया था। मिस्टिसिज्म के पर्यायवाची शब्द के संबंध में पण्डित मुकुटधर पाण्डेय जी ने द्विवेदी जी तथा बख्शीजी से पूछा था। उन्होंने क्रम से आध्यात्मवाद और शक्तिवाद शब्द सुझाये थे, पर वस्तुस्थिति के विचार से वे पाण्डेयजी को कुछ जँचे नहीं।

 

 

 

छायावादकी अनेक प्रकार से आलोचना होने लग इस पर पण्डित मुकुटधर पाण्डेय जी का लेख माधुरी पत्रिका में मिस्टिजम का पर्याय शीर्षक से प्रकषित हुआ। जिसमें पाण्डेय जी ने स्पष्ट किया किछायावादके लिए बंगला में अभी तक कोई शब्द नही गढा़ गया है। मिस्टिसिज्म ही मूल शब्द के रूप में लिखते हैं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के विचार से छायावाद शब्द बँगला साहित्य से ही आया है।  इस तर्क का खण्डन आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदीजी ने किया था। यह शब्द बिल्कुल नया है।  यह भ्रम ही है कि इस प्रकार के काव्य को बँगला में छायावाद कहा जाता है।’’5 उपर्युक्त उद्धरणों से यह तो निर्विवाद सिद्ध है कि बँगला साहित्य में छायावाद के प्रथम कवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर है और हिंदी में प्रथम प्रयोक्ता कवि पण्डित मुकुटधर पाण्डेय हैं।

 

हिंदी में छायावाद के पूर्व, हितकारिणी पत्रिका में प्रकाषित पण्डित मुकुटधरपाण्डेय की ही कविताचरणप्रसादमें प्रथम बार शब्दगत हुआ है। इसके पूर्वछायावादशब्द ही नहीं वरन् हिंदी में किसी भी वाद का प्रचलन नहीं हुआ था।मेरे विचार छायावाद की एक सुन्दर व्याख्या भी है। ये ऐतिहासिक और अमर पंक्तियां है-

‘‘लोनिज अन्तर से ममअन्तर शाषाजान

लिख सकती लिपि शीक्या उसके भेद महान

भाषा क्या वह छायावाद

है कहीं उसका अनुवाद’’6

 

‘‘छायावाद’’ के कवि वस्तुओं को असाधारण दृष्टि से देखते हैं। उनकी रचना की सम्पूर्ण विषेषताएँ उनकी इस दृष्टि पर ही अवलम्बित रहती है। वह क्षण भर में बिजली की तरह वस्तु को स्पर्ष करती हुई निकल जाती है। अस्थिरता और क्षीणता के साथ उसमें एक तरह की विचित्र उन्मादकता और अंतरंगता होती है जिसके कारण वस्त ुउसके प्रकृत रूप में नहीं किंतु एक अन्य रूप में दिख पड़ती है। उसके इस अन्य रूप का संबंध कवि के अन्तर्जगत से रहता है।  यह अंतरंग दृष्टि हीछायावादकी विचित्र प्रकाशन रीति का मूल है।  इस प्रकार मुकुटधरजी की सूक्ष्म दृष्टि नेछायावादकी मूल भावनाआत्मनिष्ठ अन्तर्दृष्टिको पहचान लिया था। जब उन्होंने कहा कि चित्र दृश्य वस्तु की आत्मा का ही उतारा जाता है, तोछायावादकी मौलिक विषेषता की ओर संकेत किया। छायावादी कवियों की कल्पना प्रियता पर प्रकाश डालते हुए मुकुटधरजी कहते हैं-उनकी कविता देवी की आंखे सदैव ऊपर की ओर उठी रहती है। मत्र्यलोक से उसका बहुत कम संबंध रहता है; वह बुद्धि और ज्ञान की सामथ्र्य सीमा को अतिक्रमण करके मनप्राण के अतीतलोक में ही विचरण करती रहती है।7

 

प्रथम निबंधकविस्चातन्त्र्यमें मुकुटधरजी ने रीति ग्रन्थों की परतंतत्रता से मुक्त होकर कविता में व्यक्तित्व तथा भाव, भाषा, छंद प्रकाषन रीति आदि में मौलिकता की आवश्यकता पर जोर दिया है। दूसरा निबंध छायावाद क्या है? आरम्भ में ही लेखक कहता है अंग्रेजी या किसी पाष्चात्य साहित्य अथवा बंग साहित्य की वर्तमान स्थिति की कुछ भी जानकारी रखने वाले तो सुनते ही समझ जायेंगे कि यह शब्दमिस्टिसिज्मके लिए आया है। फिर भी छायावाद एक ऐसी मायामय सूक्ष्म वस्तु है कि शब्दों द्वारा उसका ठीक-ठीक वर्णन करना असम्भव है क्योंकि ऐसी रचनाओं में शब्द अपने स्वाभाविक मूल्य खोकर सांकेतिक चिन्ह मात्र हुआ करते हैं।

 

छायावाद के कलापक्ष पर विचार करते हुए मुकुटधरजी काव्य में चित्रकारी और संगीत का अपूर्व एकीकरण उसका आदर्ष मानते हैं।

 

छायावाद पर लगाये गएअस्पष्टताआदि आरोपों का स्पष्टीकरण करते हुए अंत में श्रीमुकुटधर पाण्डेय ने लिखा हैछायावादकी आवष्यकता हम इसलिए समझते हैं कि उससे कवियों को भाव प्रकाषन का एक नया मार्ग मिलेगा।  इस प्रकार के अनेक मार्गों अनेक रीतियों का होना ही उन्नत साहित्य का लक्षण है।

 

छायावाद से लोगों का क्या मतलब है, कुछ समझ में नहीं आता।  शायद उनका मतलब है कि किसी कविता के भावों की छाया यदि कही अन्यत्र जाकर पड़े तो उसे छायावादी कविता कहनी चाहिए। उनके विचार से अन्योक्ति पद्धति ही छायावाद है।

 

पण्डितमुकुटधर पाण्डेय के काव्य में छायावाद की निम्नलिखित विषेषताएँ परिलक्षित हुई हैं; स्वच्छन्दतावाद, मौलिकता, रहस्यवाद, स्वातंत्र्य चेतना, लोक-चेतना, अस्पष्टता, सांकेतिकताया प्रतीकात्मकता, भावविव्हलता, कल्पना की स्वच्छंद उड़ान, आत्मनिष्ठता, आध्यात्मिकता, चित्रात्मक भाषा, प्रकृति सौंदर्य का चित्रण, संवेदना, प्राणीमात्र के प्रतिदया, करूणा प्रेम सहानुभूति की भावना आदि।

छायावाद के सम्बन्ध में महत्वपूर्ण तथ्य -

1.        पं. महावीरप्रसाद द्विवेदी नेसरस्वतीमें सुकवि किंकर के नाम से छायावाद के नाम से विगर्हणा की थी। लिखा थाकिसी अन्य कविता की जिस पर छाया पड़ती हो उसे छायावाद कहते हैं।

2.        हिंदी के काव्य साहित्य में छायावादी कविताओं की एक बाढ़ सी गई। पर वे कागजी फूल थे, रंग है जिसमें मगर बूए वफा कुछ भी नहीं। अनधिकारी नवयुवक छायावाद का लाभ उठाते हुए वागार्थ विरोधी अण्टसण्ट मन में आया लिखने लगे। तब मैंनेमाधुरीमें एक लेख लिखकर विद्वानों से मिस्टिसिज्म के पर्याय के रूप में अन्य नाम सुझाने का आग्रह किया था पर उस पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। छायावाद नाम जो चल पड़ा सो चल पड़ा।

3.        कानपुर में एक विराट कवि सम्मेलन हुआ था। हरिऔध ने अपने अध्यक्षीय भाषण मेंछायावादके अर्थ में सबसे पहलेरहस्यवादशब्द का प्रयोग किया था। पर उनमें कुछ अंतर था। . रामचन्द्र शुक्ल ने अपनी हिंदी साहित्य के इतिहास में इस पर अच्छा प्रकाश डाला। वे लिखते हैं-

 

छायावादका प्रयोग दो अर्थों में समझना चाहिए। एक तोरहस्यवादके अर्थ में जहां उसका संबंध काव्य-वस्तु से होता है-अर्थात् कवि उस अनन्त और अज्ञात प्रिय को आलम्बन बनाकर अनन्तचित्रमयी भाषा में प्रेम की अनेक प्रकार से व्यंजना करता है।

 

छायावादशब्द का दूसरा प्रयोग काव्य शैली या पद्धति विशेष के व्यापक अर्थ में है। इस शैली के भीतर किसी वस्तु का चित्रण या वर्णन किया जा सकता है।8

4.        डाॅ. रामकुमार वर्मा के अनुसार ‘‘परमात्मा की छाया आत्मा में, आत्मा की छाया परमात्मा में पड़ने लगती है, तभी छायावाद की सृष्टि होती है।’’

5.        डाॅ. नगेन्द्र के अनुसार, ‘‘छायावाद स्थूल के प्रति सूक्ष्म का विद्रोह है।  यह एक विषेश प्रकार की भाव पद्धति है, जीवन के प्रति विशेष भावात्मक दृष्टि कोण है।’’

6.        महादेवी वर्मा के अनुसार, ‘‘छायावाद तत्वतः प्रकृति के बीच जीवन का उद्गीथ है।’’ उसका मूलदर्षन सर्वात्मवाद है।’’

7.        आचार्य नन्ददुलारे बाजपेयी के अनुसार, ‘‘मानव तथा प्रकृति के सूक्ष्म, किन्तु व्यक्त सौन्दर्य में आध्यात्मिक छाया का भान छायावाद की सर्वमान्य व्याख्या हो सकती है।’’

 

‘‘प्रेम, प्रकृति और मानव सौन्दर्य की स्वानुभूतिमयी रहस्य परक सूक्ष्म अभिव्यंजना जिस काव्य में होती है, उसे छायावाद कहा जाता है।’’9

 

कुररी के प्रतिछायावाद की प्रथम कविता है इस कविता में भारतवर्ष की संवेदना निहित है। कवि बाल्मीकि क्रौंचपक्षी के जोड़े में से बहेलिये द्वारा नर क्रौंच मारने औरपक्षी के मरने के पश्चात् मादा क्रौंचपक्षी के हृदय की पीड़ा को अनुभव किया और विश्वप्रसिद्ध रामायण महाकाव्य का सृजन किया। ठीक उसी प्रकार पाण्डेय जीकुररीपक्षीके करूण विलाप को सहन नही कर सका व्याकुल और व्यग्र हो गया और हिंदी में छायावाद की प्रथम कविता कुररी के प्रतिकाव्य का सृजन किया।

 

बता मुझे   विहग विदेषी अपने जी की बात

पिछड़ा था तू कहां, रहा जो कर इतनीरात

पं.मु.पा..पृ.क्र. 57(10)(1)

 

कुररीके प्रतिकाव्य में कवि का रहस्यात्मक सत्ताभावनात्मक दृष्टि समन्वित तथ्यों का उद्घाटन है।  ये प्रवजन पक्षी (डपहतंजवतल इपतके) चक्रवाक और खंजन की श्रेणी के अंतर्गत आते हैं।  शरद ऋतु में इन पक्षियों का आगमन होता है।  ये पक्षी समूह में रहते हैं। इन तथ्यों से स्पष्ट हो जाता है कि ये पक्षी ठण्ड प्रदेष में निवास करते हैं। महानदी के तटवर्ती क्षेत्रों में इनकी क्रीड़ा को देखकर कवि अपने भाव को इस काव्य के माध्यम से व्यक्त किये हैं।

 

कुररी के प्रतिपाण्डेय जी की मौलिक रचना है इसमें कोई संदेह नहीं है। आधुनिक हिंदी साहित्य पर पाश्चात्य साहित्य का प्रभाव है। रीतिकाल के उपरांत भारतेन्दुजी ने हिंदी का जो रूप दिया वह पाश्चात्य प्रभाव से एकदम मुक्त है। सच्चे अर्थों में यदि कहें तो भारतेन्दुजी ही हिंदी गद्य के जनक हैं।  एक उड़िया शाषा के कवि ने कहाकुररी के प्रतिकविता पढ़कर शैली केस्कायलार्ककविता का स्मरण होता है।

 

श्रम की महत्ताको पाण्डेय जी नेकिसानकविता के माध्यम से हृदयस्पर्शी चित्रण किया है। किसानों के निष्छल व्यवहार को प्रकट करने में यह कविता बहुत प्रभावषाली है। किसानों के क्रिया कलापों और स्वाभाविक मनोभावों का मार्मिक एवं यथार्थ चित्रणकिसानकाव्य में हुआ है-

                   धन्य तुम ग्रामीण किसान

                   सरलता प्रिय औदार्य निधान

                   छोड़ जन संकुल नगर निवास

                   किया क्यों विजनग्राम में गेह।

                                                                             पं.मु.पा..पृ.क्र. 67(2)

महानदी की प्राकृतिक सुषमा का वर्णन पाण्डेय जी निम्नकाव्य के माध्यम से कर रहे हैं-

कितना सुंदर और मनोहर, महानदी यह तेरा रूप कल कल मय निर्मल जलधारा; लहरों की है छटाअनूप।      पं.मु.पा..पृ.क्र. 52(3)

ग्राम गुणगानकविता के माध्यम से पाण्डेय जी ग्राम की सुन्दरता, स्वच्छ, शीतल, जलवायु, ग्राम्य जनों के निष्छल व्यवहार का वर्णन निम्न पंक्तियों के माध्यम से किया है।

 

नगरों में रहता था मैं, मुझको ग्राम भाता था

छोड़ ग्राम नगरों में रहना, मुझे नहीं अब भाता है।11

छायावाद और मु.पा. डाॅ. बलदेव पृ.क्र. 36

 

छायावाद की उपयोगिता-छायावादकी उपयोगिता क्या है इसे श्रीपाण्डेय जी ने विष्व कवि रवीन्द्रनाथ के ब्तमेमदज उववद काव्य सेमेरागीतशीर्षक कविता उद्धृत कर के बताया है-

 

वत्स यह मेरा गीत प्रेमपूर्ण भुजाओं की तरह अपने सुर और लय के जाल से तुम्हेंवेश्ठितकरेगा।

ज्ब तुम अकेले रहोगे, तब तुम्हारे पास बैठकर दुख सुख की बाते करेगा और जब तुम भीड़-भड़क्के में रहोगे तब वह तुम्हे उसके संघर्ष से बचाकर रखने में चहार दीवारी का काम करेगा।

 

यह मेरा गीत तुम्हारे स्वप्नों को पंख दान करेगा और तुम्हारे हृदय को अज्ञान के किनारे लेकर उतार देगा।

 

यह मेरा गीत स्नेह-स्निग्ध चुम्बन के समान तुम्हारे कपोलों का स्पष्ज्ञ्र करेगा।

यह मेरा गीत तुम्हारी आँखों की पुतली पर जा बैठेगा और तुम्हें ऐसी दृष्टि प्रदान करेगा कि तुम पदार्थों के  अंतः प्रदेष में प्रवेष कर सकोगे।

 

और जब मेरी वाणी मृत्युलीन हो मौन हो जायेगी तब यह मेरा गीत ही तुम्हारे जागृत हृदय में वार्तालाप करेगा।’’ 12(1)

 

हिंदी में छायावादशीर्षक में लेखक का कथन है- ‘छायावादअध्यात्म जगत को लेकर खेलने की वस्तु है। जीवन यात्रा में उसका बहुत कम हाथ रहता है।  अतएव केवल उसे ही लेकर जो जीना चाहते हैं वे अवष्य भूलते हैं। वह मुट्ठी भर लोगों की क्रीड़ा भूमि है।  उसके साधार जनता का निर्वाह नहीं।  यदि पृथ्वी पर स्वर्ग भी उतर आये तो भी ऐसा समय नही आयेगा की छोटे से लेकर बड़े तक सब लोग छायावाद से आत्मतृप्ति लाभ कर सकेंगे।’’ 12(2)

 

छत्तीसगढ़ के महान सपूत पण्डित मुकुटधर पाण्डेय का योगदान भारतीय हिंदी साहित्य के इतिहास में अविस्मराीय है।  प।िडत मुकुटधर पा।डेय ने          पर्यायवाची शब्द के रूप मेंछायावादनामक एक नवीन शैली स्थापित करने में सफल रहा।  ‘कुररी के प्रतिपाण्डेय जी को श्रेष्ठतम रचना है जो उनके भावुक हृदय एवं प्रकृति प्रेम का परिचायक है।  छायावाद राश्ट्रीय जागरण की काव्यात्मक है जो एक ओर विदेषी पराधीनता से मुक्ति चाहता है और दूसरी ओर पुरानी रूढ़ियों से उपर्युक्त तथ्यों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि पण्डित मुकुटधर पाण्डेय ही छायावाद के प्रवर्तक हैं।

 

संदर्भसूचीः

1.        छायावाद और पं. मुकुटधर पाण्डेय, डाॅबलदेव, पृ.क्र. 136

2.        हिंदी साहित्य का इतिआ. रामचंन्द्र शुक्ल, मुकुटधर पाण्डेय व्यक्ति एवं रचना, संपादक महावीर अग्रवालपृ.क्र. 82

3.        वही               ,,

4.        छायावाद और पं. मुकुटधर पाण्डेय, डाॅ, बलदेव, पृ.क्र. 149

5.        छायावादऔरपं. मुकुटधर पाण्डेय, डाॅ, बलदेव, पृ.क्र. 137

6.        वही 

7.        मुकुटधर पाण्डेय व्यक्ति एवंरचना, प्रथम रष्मिलेख डाॅ, नाम वर सिंह संपादक महावीर अग्रवाल पृ. क्र. 171-72

8.        मुकुटधर पाण्डेय व्यक्ति एवं रचना, छायावाद एक सिंहाव लोकन मुकुटधर पाण्डेय, संपादक महावीर अग्रवाल, पृ.क्र. 264

9.        प्रतियोगिता साहित्य सीरीज, डाॅ. अषोक तिवारी, पृ.क्र. 73

10.       पं. मुकुटधरपाण्डेय चयनिका, प्रा. दिनेष पाण्डेय एवण् बिहारी लाल साहू पृ.क्र. 57, 67, 52

11.       छायावाद और पं. मुकुटधर पाण्डेय डाॅ. बलदेवपृ.क्र. 36

12.       छायावाद के प्रथम समीक्षक श्री मुकुटधर पाण्डेय का छायावाद ईष्वर शरण पाण्डेय संपादक महावीर अग्रवालपृ.क्र. 87, 86

 

 

 

 

Received on 06.08.2019            Modified on 10.09.2019

Accepted on 30.09.2019            © A&V Publications All right reserved

Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2019; 7(4):751-755.